गर्मियों में दही को जमाने, खाने की उत्तम विधि, दही का सेवन प्राय अधिकतर लोग करते हैं

By heygobind Date March 27, 2020

दही का सेवन प्राय अधिकतर लोग करते हैं, और शास्त्रों में भी दही के लाभ लिखित हैं परंतु जो इसका सही तरीके से, ऋतु-अनुकूल, सेवन करने का ढंग जानना, सावधानीपूर्वक व उसके अनुसार सेवन करना बहुत ही आवश्यक है, अन्यथा दही स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक भी हो सकती हैं।
गाय के दूध से दही का अपना ही अलग लाभ होता हैं । पद्मपुराण में भी आता है कि दही सेवन करने के बाद 21 रात्रि तक वह शरीर में अपना प्रभाव रखता है। आयुर्वेद में वर्णित हैं की सभी प्रकार की दही में गाय के दूध की दही अति उत्तम हैं । यह विशेषरूप से अम्ल रसयुक्त, उष्ण, मधुर, रुचिकारक, पवित्र, पुष्टि कारक, प्रसन्नता, भूखवर्धक तथा वातशामक एवं कफ-पित्त-वर्धक होता है । यह बल-वीर्य एवं मेद मांस धातुओं को भी बढ़ाता है । दही की मलाई की ऊपरी पर्त शुक्रवर्धक होती है । सुश्रुत-संहिता के अनुसार मीठा दही कफ और मेद को बढ़ाता है, जो दही खट्टी होती हैं वो कफ और पित्त को बढ़ाता है तथा अति ज्यादा खट्टा दही रक्त को दूषित करती है। यदि दही ठीक से न जमी हो तो वह त्रिदोष-प्रकोपक करता है। यदि बच्चे  दस्त से पीड़ित हो तो दही के ऊपर का पानी पिलाने से उनको शीघ्र आराम मिल जाता हैं।
दही को किस प्रकार से  जमायें?
दही मीठी होती हैं या खट्टी उसके जमाने की विधि पर निर्भर करती हैं। (1) अच्छी दही जमाने के लिए दूध का बहुत शुद्ध होना जरूरी है। (2) दूध को मिट्टी के पात्र या स्टेनलेस स्टील के बर्तन में धीमी आँच में  उबालें । 1 से 2 उबाल तक ही उबालना चाहिए, जिससे दूध के जो पोषक तत्व नष्ट न हों जाये। मिट्टी के कुल्हड़ में जमा हुआ दही बहुत ही गाढ़ा एवं मीठा होता है। (3) यदि अधिक गर्म दूध को जमाने से दही पानी छोड़ देता है और दही को खट्टा भी कर देता हैं और दूध ठंडा होने से दही सही से जमता नहीं । (4) जामन, थोड़ा-सा दही को 50 -70 ग्राम दूध में खूब मिलाना चाहिए । फिर पूरे दूध में डाल के ढककर रख दें । एक दिन से ज्यादा पुराना जामन प्रयोग करने से दही खट्टा हो जाता है। फिटकरी, नींबू के रस या खटाई से बनाया दही हानिकारक होता है। (5) जब ठंड के दिन होते हैं तो दही को जमने में अधिक समय लग जाता है इसलिए दूध में जामन डालने के बाद बर्तन को ढककर उसको कम्बल से ढक कर रख देना चाहिए। ध्यान रखें: * जो लोग विधि के अनुसार दही नहीं खाते उनको बुखार, रक्तपित्त, चर्मरोग, खून की कमी (anaemia), मोटापा, मधुमेह (diabetes), चक्कर आना एवं प्रचंड रूप से पीलिया रोग,  प्रमेह, आदि रोग उत्पन्न हो सकता हैं।
दही का सेवन किस प्रकार स्वास्थ्य-हितकर होता हैं?
क्या करें?
(1) सुश्रुत संहिता के अनुसार धीमी आँच में उबाले हुए दूध से बनी हुई दही में ये गुण आ जाते हैं वात पित्तशामक, रुचिकर, धातु (रस, रक्त, मांस आदि वर्धक, बल वर्धक व भूख को बढ़ाने वाला होता हैं।
(2) हेमंत और शिशिर ऋतु (अक्टूबर से फरवरी) में दही खाना उत्तम होता है ।
(3) मूँग की दाल के साथ दही को लेना लाभदायक होता है । दुर्बल और वात प्रकृति के लोगों को गाय के घी के साथ तथा कफ प्रकृतिवालों को शहद के साथ और पित्त प्रकृतिवालों को मिश्री व आँवले के साथ दही का को लेना चाहिए।
(4) दही के साथ पुराने गुड़ का को लेने से वातशामक, वीर्य एवं रस, रक्त आदि वर्धक, तृप्तिदायक होता है ।
(5) दुर्बलता, अरुचि, दस्त व शरीर के कृश होने पर तथा दोपहर में दही खाना हितकर है ।

क्या न करें ?
(1) अष्टांगहृदय के अनुसार दही को हर रोज नहीं खाना चाहिए । खट्टे और अधपक्का दही का सेवन नहीं करना चाहिए ।
(2) ग्रीष्म, शरद और वसंत ऋतु में दही खाना निषिद्ध होता हैं। शास्त्रों के अनुसार वर्षा ऋतु में दही-सेवन निषिद्ध नहीं है परन्तु वर्तमान परिवेश को देखते हुए जानकार वैद्य इस ऋतु में दही-सेवन को अहितकर मानते हैं ।
(3) केवल दही शरीर के स्रोतों विभिन्न प्रवाह-तंत्रों में अवरोध उत्पन्न कर देता हैं इसलिए अकेले दही का सेवन नही करना चाहिए।
(4) गर्म करके दही को  खाना, कुछ व्यंजन बनाते समय उनमें दही मिलाना, खोये की मिठाई  के साथ दही तथा केला आदि फल खाना, दही की लस्सी में बर्फ मिलाना - इनसे स्वास्थ्य की बहुत हानि होती है ।
(5) सूर्यास्त के बाद दही नहीं खाना चाहिए ।
(6) दही को फ्रिज और बासी दही सेवन करना हानिकारक है ।

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