Shattila Ekadashi 2021 : माघ में मास में षटतिला एकादशी

By heygobind Date February 7, 2021

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से कहा: हे भगवन्! माघ माह में कृष्णपक्ष की एकादशी कौनसी आती हैं? एकादशी की विधि क्या हैं और उसका फल क्या मिलता हैं ? आप कृपा करके हम सबको इस एकादशी का माहात्म्य बताये।
श्री कृष्ण जी ने कहा: हे नृपश्रेष्ठ! माघ मास के कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम  षटतिला हैं और ये एकादशी सभी पापों का नाश करती हैं। षटतिला एकादशी का माहात्म्य में मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य जी ने जो कहा उसको सुनो।
दाल्भ्य जी ने कहा: हे ब्रह्मन्! मृत्युलोक में जो आते है प्राय उनसे कोई न कोई पाप हो जाते हैं। उनको नर्क में जाना पड़ता हैं, नर्क से बचने के लिए कौन सा उपाय करना चाहिए? आप बताने की कृपा करें।
पुलस्त्य जी ने कहा: महाभाग! माघ मास में षटतिला एकादशी के दिन मनुष्य को नहा धोकर पवित्र होकर इन्द्रियसंयम रखते हुए क्रोध, काम, लोभ और चुगली आदि बुराइयों को त्याग करना चाहिए। श्री हरि का ध्यान करते हुए जल से पैर धोकर भूमि पर पड़े हुए गोबर का संग्रह करे। उसमें कपास और तिल मिलाकर 108 पिंडिकाएँ बनाये। फिर कृष्णपक्ष की एकादशी करने के लिए नियम ग्रहण करके, शुद्ध भाव से श्रीविष्णुजी का पूजन करे।
किसी भी प्रकार की भूल हो जाने पर श्रीकृष्ण का नाम का जप करें । रात्रि को जागरण करें। अरगजा, नैवेघ, चन्दन, कपूर  आदि सामग्री से चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीहरि का पूजन करें। उसके पश्चात् श्री हरी का स्मरण करके बार-बार श्रीकृष्ण नाम का उच्चारण करते हुए नारियल, कुम्हड़े अथवा बिजौरे के फल से श्री हरि को विधिपूर्वक पूजकर अर्ध्य दें।
यदि सब सामग्रियों का अभाव हो तो सौ सुपारियों के द्वारा भी पूजन कर सकते हैं और अर्ध्यदान दिया जा सकता हैं। अर्ध्य का मंत्र इस प्रकार है:
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव ।
संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।
सुब्रह्मण्य नमस्तेSस्तु महापुरुष पूर्वज॥
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते । 
‘हे सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीकृष्णजी! आप बहुत ही दयालु हो। हम आश्रय-हीन जीवों के आश्रयदाता आप ही हो। हम सभी इस संसार समुद्र में डूब रहे हैं, हे नाथ आप हम पर प्रसन्न हो। कमलनयन! विश्व-भावन! सुब्रह्मण्य! सबके पूर्वज! आपको बारम्बार नमस्कार हैं! हे जगत्पते! आप मेरा दिया हुआ ये अर्ध्य माता लक्ष्मीजी के साथ स्वीकार करें।’
उसके पश्चात् ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिए। उनको जल का घड़ा, छाता, जूता और वस्त्र का दान करना चाहिए। दान के समय मन ही मन स्मरण करते हुए कहना चाहिए : ‘इस दान से श्री कृष्ण जी  मुझ पर प्रसन्न हों ।’ हे द्विजश्रेष्ठ ! विद्वान और व्रत रखने वाले पुरुष को चाहिए कि वह तिल से भरा हुआ पात्र भी दान करे। उन तिलों के बोने पर उनसे जितने भी शाखाएँ पैदा होती हैं, उतने हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । तिल से स्नान करना चाहिए, तिल का उबटन लगाना चाहिए, तिल वाला पानी पीना चाहिए, तिल का दान करना चाहिए और तिल को भोजन के काम में ले ।’

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