श्राद्ध का महत्व और नियम  13 सितम्बर से 28 सितम्बर तक, श्राद्ध में नियम, जिससे पितृ प्रसन्न होते हैं।

By heygobind Date January 28, 2019

मनुष्य के मृत्यु के पश्चात जीवात्मा को उत्तम मध्यम और कनिष्ठ कर्म के अनुसार नर्क य स्वर्ग में जाना होता हैं । जिसके जैसे पाप पुण्य कम होने पर वह फिर इस धरती पर आ जाता हैं। पितृयान मार्ग स्वर्ग में जाना होता हैं और जन्म मरण का जो बन्धन है उससे छुट जाना देवयान मार्ग कहलाता हैं।

यदि आपके पूर्वज अभी कहीं पर भी हैं चाहे मनुष्य रूप में ही हैं। और आप उनके निमत्त श्राद्ध कर रहे हो तो उस श्राद्ध के कारण आपके पितृ जिधर भी हैं, उनको उस दिन कुछ-न-कुछ लाभ अवश्य मिलेगा।

प्रभु श्रीराम जी भी श्राद्ध करते थे। हर मनुष्य के ऊपर पितृऋण, देवऋण और ऋषिऋण रहता ही है। श्राद्ध द्वार तो पितृ का ऋण से मनुष्य मुक्त हो जाता हैं। देवताओं के पूजन और यज्ञ भाग देने पर वह देव ऋण से भी मुक्त हो जाता है। संतों के जो उचित विचार हैं उनको अपने जीवन में उतारने से, उनका प्रचार करने से मनुष्य ऋषि ऋण से मुक्त हो जाता हैं।

श्राद्ध के लिए ब्राह्मण

मनु स्मृति' में लिखा हैं:

"जो क्रोध से रहित, प्रसन्न और लोक हितकारी हो इस प्रकार के श्रेष्ठ ब्राह्मणों को संतो ने श्राद्ध करने के लिए देवतुल्य माना है।" (मनुस्मृति 3.213)

श्राद्ध में भोजन

जो भोजन बनाना हो वो बहुत ही मधुर, भोजन करने के वाले के अनुसार तथा स्वादिष्ट होना चाहिए।

" गाजर, प्याज और लहसुन आदि वस्तु जो गन्ध और रस के कारण निशिद्द हैं, श्राद्धकर्म में उपयोग नहीं करना चाहिए। (वायु पुराण 78.12)

श्राद्ध में दान

अपने सामर्त्यानुसार ब्राहमण को दान देना चाहिए। दान देते समय मन ही मन ये मन्त्र अवश्य बोले

अक्षतं चास्तु में पुण्यं शांति पुष्टिर्धृतिश्च मे।

यदिच्छ्रेयस् कर्मलोके तदस्तु सदा मम।।

"हे नाथ मेरा पुण्य अक्षय हो हमको शांति पुष्टि एव धृति प्राप्त हो। इस लोक में जो भी कल्याणकारी वस्तुएँ हैं, वे सदा हमको मिलती रहें।

श्राद्ध के दिन दान देते समय चांदी का दान, चांदी के अभाव में चांदी का दर्शन अथवा उसका केवल नाम लेना भी पितरों को बहुत, अनन्त एवं अक्षय स्वर्ग देनेवाला दान माना जाता है।

श्राद्ध की तिथि

हमारे पितृ जिस भी तिथि को इस संसार से चले गये हैं, श्राद्ध के समय उसी तिथि को श्राद्ध किया जाना चाहिए जो सर्वश्रेष्ठ होता है। लेकिन जिनकी तिथि याद न हो उनके लिए अमावस्या उपयुक्त माना जाता हैं।

गरूड़-पुराण में श्राद्ध की महिमा

" पितृगण वायुरूप में अमावस्या के दिन अपने घर के दरवाजे आते हैं और अपने स्व-जनों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं । जब तक संध्या, सूर्यास्त नहीं हो जाता तब तक वो वहीँ रहते हैं

और पितृ वे भूख और प्यास के कारण व्याकुल होकर वही पर रहते हैं । जब सूर्य अस्त हो जाता हैं तो पितृ बहुत ही निराश और दुःखित मन से अपने अपने लोक में चले जाते है। इसलिए अमावस्या के दिन प्रयत्न-पूर्वक श्राद्धक्रम अवश्य ही करना चाहिए।

*श्राद्ध के समय पालन करने वाले नियम
छोटे बच्चों एवं साधु संन्यासियों के लिए श्राद्ध नहीं किया जाता हैं।

जिसको भी जिस दिन श्राद्ध करना हो उसके एक दिन पहले ही संयमी, श्रेष्ठ और साधनावाले ब्राह्मणों को निमंत्रण दे देना चाहिए । यदि श्राद्ध के दिन भी कोई अनिमंत्रित ब्राह्मण आपके घर पर आ जाए तो उनको भी भोजन अवश्य कराना चाहिए।

श्रद्धा से मनुष्य द्वारा गोत्र और नाम का उच्चारण करके दिया हुआ अन्न आपके पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं, उनको वैसा ही मिलता है। विष्णु पुराणः 3.16,16
श्राद्ध काल के समय में द्रव्य, भूमि,, शरीर, मंत्र, स्त्री, मन और ब्राह्मण सात चीजें बहुत शुद्ध होनी चाहिए।

श्राद्ध के समय विशेष तीन बातों को ध्यान में रख कर चलना चाहिएः अक्रोध, जल्दबाजी नही करना और शुद्धि।
श्राद्ध में मंत्र का भी बहुत महत्त्व होता हैं। हमारे द्वारा दी गयी वस्तु कितने भी मूल्यवान क्यों न हो, पर यदि हम मन्त्र का सही उच्चारण न करे तो सारा काम अस्त से व्यस्त हो सकता हैं । मंत्र का शुद्ध उच्चारण होना चाहिए और जिनके निमित्त श्राद्ध कर रहे हो उनका नाम भी नाम का उच्चारण भी बहुत शुद्ध रखना चाहिए।

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